प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम,
आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, स्वाभिमान पर, स्वभाव+अभिमान, इन दो शब्दों से मिलकर यह बना है, जो भी प्रकृति से हमें
प्राप्त हुआ, वही सत्य है।
स्वाभिमान, यानी अपनी मूल प्रवृत्ति या
प्रकृति जो हमें ईश्वर ने प्रदान की है, वही हमारा स्वभाव है, या स्वाभिमान भी है।
सभी की अपनी- अपनी आदतें होती हैं,
मगर एक बात अगर हम गहराई पूर्वक विचार करें , तो वह यह है, कि मानवीय करुणा से
ओत-प्रोत होना, मनुष्य होना यह हम कभी न भूलें।
हमारा जो भी स्वभाव है, स्वाभिमान है,
वह ऐसा हो, जिससे हमारे आत्म सम्मान को
भी ठेस न पहुंचे, साथ ही अन्य के भी आत्म सम्मान को हम ठेस न लगायें।
मनुष्य की मूल प्रकृति यह रही है, कोई उसे पहचाने, जाने, उसकी लोकप्रियता हो,
यह एक ऐसी ख्वाहिश है, जो सभी के अंतर्मन में बसी होती है।
अपनी मौलिक विशेषताओं को हमें
पहचानना चाहिये व पूर्ण ईमानदारी से उस
पर कार्य करें, अगर हममें कोई भी हुनर है,
तो उसे हमें लगातार, निरंतर अभ्यास के द्वारा
हम किसी भी विधा में शीर्ष पर जा सकते हैं।
हम सभी के जीवन में उतार- चढ़ाव, जय पराजय, हानि -लाभ, सभी आते ही हैं, मगर अपने अच्छे समय में हम बिल्कुल शांतचित्त होकर उसका आनंद उठायें, व विपरीत समय होने पर भी धैर्य बनाए रखें।
अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को
कभी भी नीचा न होने दे, हम जीवन में जो भी कर रहे होते हैं, वह कोई और भले ही नहीं जानता हो, हम स्वयं तो जानते ही हैं।
जैसे ही हम अपनी विशेषताओ पर सही तरीके से कार्य करना सीख जाते हैं, जीवन को सही अर्थों में हम जीना ही सीखने है।
जीवन का हर पल आनंदमय व खुशनुमा ही है, मगर उसके लिए हमें बाह्य जगत के साथ अपने आंतरिक जगत यानी अपने मनोभावों पर भी कार्य करना होंगा।
शांतचित्त से हम सब घटनाक्रम जो हमारे जीवन में घटित हुए हैं, कुछ में तो हमारी मर्जी शामिल होती है, कुछ में नही।
अगर प्रकृति ने हमें सामंजस्यता का गुण
प्रदान किया है, तो हमें आगे बढ़कर नेतृत्व करना ही चाहिये, क्योंकि यह गुण आपके नेतृत्व की क्षमता को प्रदर्शित करता है।
इसी प्रकार हम अपने स्वभाव के अनुसार अगर अपनी जीवन शैली को ढालते
हैं, तो हमें जीवन में प्रतिकूल भी अनुकूल जाना पड़ेगा।
अपने निजी स्वभाव को समझकर फिर उस पर पूर्ण रूप से , दृढ़ता पूर्वक अगर हम अमल करते हैं, तो हमें कामयाबी भी प्राप्त
होगी, व अपनी पहचान को हम अपने उस
गुण की बदौलत ऊंचाई पर ले जा सकते हैं।
धन हमें भौतिक सुख सुविधाएं तो प्रदान कर सकता है, मगर हमारा आंतरिक वैभव हमारी असली पूंजी है।
भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही पहलू जरूरी भी है।
सबके अनुभव अपने हैं, समस्याएं भी अलग-अलग है, मगर अपने स्वभाव को समझकर हम अपने कार्य को अगर करते हैं,
और अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते हैं, धैर्य पूर्वक हम उनका सामना करते हैं, चीजों को वास्तविक रूप से किस प्रकार घटेगी ,देखते हैं, तो आपकी कामयाबी की राह पक्की है।
विशेष:- हम सभी को ईश्वर ने कोई न कोई मौलिक विशेषता प्रदान की है, और उसी मौलिक विशेषता को हम पहचाने व पूर्ण ईमानदारी से उस पर कार्य करें, आपका
स्वाभिमान भी सुरक्षित रहेगा, कामयाबी भी प्राप्त होगी, अपने लक्ष्यों के प्रति ईमानदार रहे।
आपका अपना
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद,
वंदेमातरम्।