प्रिय पाठक गण,
               सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, प्रथम आप सभी को रामनवमी के पावन पर्व की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं  ।
              आज हमारे समाज में जो भी स्थिति है, प्रभु श्री राम का दृढ़ चरित्र और अधिक प्रासंगिक है, हमें उनके चरित्र से प्रेरणा प्राप्त होती है। 
            वह एक आज्ञाकारी पुत्र, सभी को प्रेम करने वाले भाई, 
समाज को अपनी मर्यादित आचरण से शिक्षा देने वाले, अपने चरित्र से समाज में सही मूल्य की प्रतिस्थापना का श्रेय अगर किसी को है तो वह श्री राम है।
           उनकी किसी भी भूमिका, चाहे वह मित्र की हो, शिष्य की हो, प्रजा पालक की हो, रिश्तो की मर्यादा की हो, चाहे बात सामाजिक मर्यादा की हो, वह सभी जगह पूर्ण रूप से खरे उतरे हैं। 
          उनके राजसिंहासन पर बैठने की घोषणा होने के बाद कि उनका राजतिलक होने जा रहा है , अचानक वनवास की सूचना प्राप्त होने पर भी वे विचलित नहीं होते हैं, और अपने पिता की आज्ञा का सहर्ष  पालन करते हैं।
           एक एक सखा या मित्र के रूप में सुग्रीव व विभीषण
कि वे जिस प्रकार मदद करते हैं, वह सखा धर्म का भी एक अनुकरणीय उदाहरण है। 
           रामायण में सुंदरकांड में प्रसंग आता है विभीषण अपने भाई रावण को छोड़कर श्री राम जी की शरण में आते हैं, तब वे अपने साथियों से विचार करते हैं  की शत्रु पक्ष से उनका भाई 
हमसे मित्रता चाहता है, हमें क्या करना चाहिए, सब सुग्रीव उन्हें बंदी बनाने की सलाह देते हैं, लेकिन श्री राम जी उन्हें मना कर देते हैं ,वह कहते हैं की भले शत्रु पक्ष से हो लेकिन वह हमारी शरण में आया है, हम उनकी रक्षा करेंगे, तो ऐसा जिसका भाव हो, वे श्रीराम है।
             अगर हम अंग्रेजी शब्द Ram का विश्लेषण करें, 
तो अर्थ होगा Right action man यानी  जिस व्यक्ति की प्रत्येक क्रिया सही हो, वह प्रत्येक व्यक्ति राम है। 
          परिवार में हमें जुड़ाव चाहिये तो हमें राम जी की समदृष्टि व त्याग नीती का अनुसरण करना होगा । पारिवारिक विभेद का
एकमात्र कारण आपसी सामंजस्य का न होना है।
             वहीं भगवान श्रीराम का जीवन अद्भुत है, वह हमें
नित्य-निरंतर प्रेरणा देते हैं।
           आइये रामनवमी के इस पावन पर्व पर हम संकल्प करें
कि उनके जीवन चरित्र का गान ही न करें, उन्हें अपने व्यवहार में भी उतारे, राम जी के स्वभाव में समद्दष्टि है, जिसकी आज हमारे समाज को और भी अधिक आवश्यकता है।
           वे मानवीय व्यवहार को किस पकार से जीवन मे आचरण द्वारा स्थापित किया जाता है, इसके एक अनुपम उदाहरण है। 
अगर उनके आचरण को हम भी अपने जीवन में उतार ले, तभी रामनवमी पर्व का जो महत्व है, उसे हम सही अर्थ में समझ सकेंगे, उनका विनम्र आचरण हमें आज भी प्रेरणा प्रदान करता है। 
            वे अपने भीतर समस्त शक्ति रखते हुए भी उसका कभी स्वप्न में भी दुरुपयोग नहीं करते हैं, उनके आचरण की जो मर्यादा है, उसका सही अर्थों में बोध होने पर ही हम रामनवमी का सही अर्थ समझ सकेंगे।
जय श्री राम 
जय हिंद 
जय भारत।
प्रिय पाठक गण,
            सादर नमन 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
 हिंदू नव वर्ष व चैत्र नवरात्रि का रविवार से शुभारंभ होने जा रहा है, आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शभकामनाएं।
         इस दिन से विक्रम संवत भी प्रारंभ हो रहा है, यह तिथि बहुत ही महत्वपूर्ण है, हम प्राचीन काल से इसे मनाते आ रहे है।
         भारतीय नव वर्ष का प्रारंभ  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इसी रविवार को प्रारंभ हो रहा है
          रविवार को सूर्योदय के समय नव वर्ष और नवरात्रि दोनों की ही शुरुआत हो रही है। 
          30 मार्च रविवार को प्रारंभ होने वाली यह नवरात्रि  व नव वर्ष आप सभी के लिए मंगलकारी हो, आप सभी को नववर्ष की अनंत शुभकामनाएं। 
          इस वर्ष के राजा सूर्य  व मंत्री भी सूर्य है, सूर्य प्रशासन का भी कारक है, इस वर्ष प्रशासनिक स्तर पर अधिक कसावट होगी,
कई कठोर निर्णय राज्य पक्ष की ओर से होंगे।
          इस वर्ष स्पष्ट वादी विचारधारा को और अधिक बल प्रदान होगा, इसका कारण सूर्य के मंत्री  व राजा दोनों होने के कारण से होगा, क्योंकि ज्योतिष में सूर्य को प्रशासन का कारक माना जाता है। निश्चित ही सामाजिक हित में कठोर प्रशासनिक निर्णय हमें इस वर्ष देखने को मिलेंगे। 
            जो भी स्पष्ट विचारधारा के राजनेता है उनकी इस वर्ष और अधिक उन्नति होगी।
           इस तिथि का प्राचीन महत्व भी बहुत अधिक है, इसी दिन सृष्टि का प्रारंभ भी हुआ था, 
           वैज्ञानिक दृष्टि से भी हम देखें तो इस समय वसंत ऋतु चल रही होती है, प्रकृति मानो हमें उत्सव का आमंत्रण देती है, 
          किसानो की फसल भी लगभग इसी समय तैयार होती है, वे भी अपनी फसलों के तैयार होने का आनंद मना रहे होते हैं, प्रकृति का वातावरण भी सुरम्य  होता है।
           इस प्रकार अनेक  कारणों से हमारा नव वर्ष और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, हमारे नव वर्ष की जो प्राचीन परंपरा रही है, वह किस प्रकार बुद्धिमत्ता पूर्वक प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए की गई है, यह एक विचारणीय विषय है। 
           हमारा हिंदू नव वर्ष ही नहीं वरन् हमारे सारे त्यौहार प्रकृति से ही जुड़े हैं व हमारी पूर्ण संस्कृति उल्लास व त्यौहारों की संस्कृति है। 
          आइये नव वर्ष का स्वागत नए सुंदर विचारों से करें, सभी के लिए मिलकर मंगल कामना करें, हम सभी संगठित हो, 
क्योंकि संगठन में ही बल होता है। 
          नव वर्ष में शुभ संकल्पों से संकल्पित हो, उन पर पूर्ण दृढ़ता पूर्वक हम कार्य करें। 
          आप सभी को पुनः नव वर्ष की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
           यह  वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग के शुभ मुहूर्त से भी संयुक्त है,
यह वर्ष अनेक प्रकार से मंगलकारी होने वाला है, राजनीतिक चेतना से यह वर्ष परिपूर्ण होगा, ईमानदार व स्पष्ट राजनेताओ की निश्चित ही इस वर्ष छवि और अधिक निखरेगी ।
            प्रशासन से जुड़े सख्त फैसलों के लिए जो भी राजनेता जाने जाते हैं उन लोगों के लिये  यह वर्ष और मंगलकारी होगा, चाहे वे राजनेता किसी भी दल से क्यों न जुड़े हो।
            कई मायनों में यह नव वर्ष क्रांतिकारी साबित होने जा रहा है, इसकी झलक नव वर्ष के प्रारंभ में ही आपको देखने को मिल जायेगी।
      आपका अपना 
      सुनील शर्मा 
      जय हिंद,
       जय भारत।
प्रिय पाठक गण, 
            सादर नमन, मुझे पूर्ण विश्वास है कि सामाजिक मूल्यों पर आधारित यह आलेख आपको अवश्य पसंद आ रहे होंगे, एक पत्रकार या नागरिक का क्या कर्तव्य हो, समाज के क्या मापदंड हो, जब समाज में विषमताएं पनपती है, तब यह दायित्व और अधिक हो जाता है, कि हम समझ में व्याप्त दोहरे मापदंडों का विरोध प्रखर स्वर में करें ।
              अगर हम ऐसा नहीं कर पाते तो सामाजिक व्यवस्था को तार-तार होने में अधिक समय नहीं लगेगा। 
             जिस प्रकार से समाज में धारणा बन रही है की धनबल,
बाहुबल व वह संगठन की शक्ति से सब कुछ किया जा सकता है,
वह अगर समाज में मूल्यो की स्थापना की दिशा में हों , तब तक तो ठीक है, पर दिशाहीन हो जाने पर उन दोहरी सामाजिक मापदंडों के खिलाफ प्रखर  मुखरता ही इन बातों को रोक सकती है। 
सामाजिक ताने-बाने को जो भी व्यवहार क्षति पहुंचाता है,
वह व्यवहार अनुचित आचरण हीं है, चाहे वह किसी भी व्यक्ति के द्वारा ही क्यों ना किया गया हो।
         यह देश का दुर्भाग्य है कि हम विचारों से अधिक व्यक्ति को
पूजने लगे, इस कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
       अगर आप सभी को लगता है, समाज में जो दोहरा मापदंड आजकल चलन में है, वह ठीक नहीं है, जिसे हम आम भाषा "अपने वाला है" कह कर टाल देते हैं, यह प्रवृत्ति सामाजिक ताने-बाने को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर देती है।
       समय पर ही अगर हम जहां भी दोहरा मापदंड दिख रहा है है, इसका विरोध करने का साहस कर सके तू मेरा यह लेख में समझता हूं, सामाजिक समरसता को ही बढ़ावा देने वाला सिद्ध 
होगा। 
विशेष:- सामाजिक मूल्यों का हनन संपूर्ण समाज की क्षति है, जहां पर भी दोहरा मापदंड दिखाई दे, कृपया व्यक्तिगत स्तर
पर निवेदन है, आप अपना स्वर अवश्य बुलंद करें।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय भारत
जय हिंद।
प्रिय पाठक वृंद,
             सादर प्रणाम, 
आप सभी सुधि पाठक गण को सादर वंदन।
    आज हम बात करेंगे समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार की चुनौतियों पर, जब तक हम जीवित हैं, संघर्ष सदा ही रहेगा, 
चुनौतियां हमेशा रहेंगी, केवल उनका स्वरूप परिवर्तित होता 
जायेगा।
          कभी वे पारिवारिक रिश्तों में वह कभी सामाजिक रिश्तों
में मत विभिन्नता के रूप में हमें नजर आयेंगी, यह भी उतना ही सत्य है कि सार्वजनिक जीवन में हमारा स्वयं का जीवन तो
शेष ही नहीं रहता। 
          विभिन्न चुनौतियों का सामना करते हुए हम अनिवार्य रूप से अपने मार्ग की समस्त बाधाओं को अपने बुद्धि कौशल का
उपयोग करते हुए आगे बढे।
         जीवन में अगर चुनौतियां ही अगर न हो तो हम समाधान किसका करेंगे।
        जीवन का असली आनंद तो तब तक ही है, जब तक जीवन में विभिन्न प्रकार की चुनौतियां मौजूद हो, संघर्ष हो , क्योंकि वही चुनौतियां वह संघर्ष हमें आंतरिक बल प्रदान करता है। 
         जितनी अधिक चुनौतियां हमारे जीवन में सामने आयेंगी,
हमारा जीवन संघर्ष जितना व्यापक होगा, तो उपलब्धियां भी उतनी ही अधिक होगी। 
          जीवन की चुनौतियां ही आपके लिए जीवन में अवसर
का भी निर्माण करती है। 
विशेष:- चुनौतियां जारी है, तो ही जीवन जारी है, जीवन की
जीवंतता ही इसकी असली ताकत है।
विभिन्न चुनौतियों का सामना करते रहे व जीवन में उपलब्धियां को पाते जाये।
आपका अपना 
सुनील शर्मा। 
जय हिंद, 
जय भारत।
प्रिय पाठक गण,
                    सादर वंदन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
                                    मुझे पूर्ण विश्वास है आप सभी को मेरे द्वारा लिखे गए लेख पसंद आ रहे होंगे। 
           मेरा आज का विषय है पारिवारिक रिश्ते, 
हम सभी के परिवार में विभिन्न विचारधाराओं के व्यक्तित्व हमें परिवार में मिलते हैं, निश्चित ही वैचारिक मतभेद स्वाभाविक ही है, जैसे किसी बगीचे में खिलते हुए कई रंगों के फूल , उन सभी फूलों की वजह से ही बगीचे की शोभा होती है। एक ही रंग के फूलो से 
उतना सौंदर्य  नहीं उत्पन्न हो सकता है। 
           इसी प्रकार हमारे पारिवारिक रिश्ते भी बगीचे में खिले हुए विभिन्न प्रकार के फूल हैं, जिनकी सबकी अपनी जगह है। 
            हम विचार करें कि पारिवारिक रिश्तों के बिना घर किस प्रकार का हो जायेगा, एक रूखापन अगर रिश्तो में आ जाता है, 
तो प्रेम के पानी से ही उन रिश्तों को सींचा जा सकता है, एक दूसरे के प्रति उचित आदर सम्मान व अपनी जवाब देही  को सही ढंग से समझना  भी पारिवारिक रिश्तों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 
             हमारे आपसी पारिवारिक रिश्ते जितने प्रगाढ़ होंगे,
उतनी ही घर में शांति व स्नेह का वातावरण रहेगा। 
            सभी के पारिवारिक रिश्ते आपसी समझ बूझ पर आधारित हो, ताकि परिवार का विखंडन न हो।
            एक एक अच्छा परिवार एक अच्छे समाज और राष्ट्र का निर्माण भी करता है, वह तो इस बात की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। पारिवारिक मूल्यों को अपने स्वयं के अहंकार से अधिक स्थान देना ही इसका एकमात्र निदान है। 
विशेष:- आज के सामाजिक परिदृश्य में पारिवारिक मूल्यों की जो अवहेलना हो रही है, वह समाज के लिए अत्यंत घातक है, इस प्रवृत्ति पर जो घर के समझदार लोग हैं, उन्हें अपनी सही दिशा कभी भी ‌ नहीं बदलना चाहिये। तभी पारिवारिक रिश्तों में मिठास बरकरार रह सकती है।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद 
जय भारत।
प्रिय पाठक वृंद,
सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
        अगर हम सही दृष्टि से किसी भी समस्या का अवलोकन करें तो समस्या का समाधान कभी-कभी समस्या के भीतर ही छुपा होता है, वृहत दृष्टि से अवलोकन करने पर हमें यह ज्ञात होता है 
कि जो भी समस्या है, वह जितनी गंभीर दिखती है, वास्तव में वह उतनी गंभीर नहीं होती है, जितनी हमें दिखाई देती है।
          संपूर्ण अवलोकन करने पर हमें समाधान प्राप्त हो ही जाता है, बुद्धिमत्ता पूर्वक चीजों का सही विश्लेषण  करने पर हमें यह ज्ञात हो जाता है, समस्या का निदान किस प्रकार किया जा सकता है।
          व्यावहारिक बुद्धि का प्रयोग करने पर हमें यह ज्ञात होता है की सभी समाधान संभव है, कोई भी समस्या कभी भी इतनी नहीं होती है कि हमें समाधान प्राप्त नहीं हो 
         सभी समाधान हमारे सामने होते हैं, पर हम सही दृष्टि से 
उस पर विचार नहीं कर पाते हैं। क्योंकि हम समग्र रूप से उसका अध्ययन नहीं कर रहे हैं। 
         हमारे आंतरिक भाव अगर अच्छे हो तो सभी समाधान हमें वहीं से प्राप्त हो सकते हैं।
         केवल पूर्ण सजग दृष्टि से समस्या का अवलोकन करने पर 
हमें वहीं से समाधान प्राप्त हो जातेहै, केवल दृढ़ इच्छा शक्ति से उन समाधानों पर जो हमें समस्या का अवलोकन करने प्राप्त हुए हैं, उन पर कार्य करने की जरूरत है।
विशेष:-किसी भी समस्या को सही दृष्टि से अगर हम सुलझाने का            प्रयास करते हैं, तो वह समस्या सुलझ जाती है, बस दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है।
आपका अपना 
 सुनील शर्मा 
जय हिंद, 
जय भारत।
प्रिया सुधी पाठक गण,
    सादर वंदन, 
आज हमारी परिचर्चा का विषय है स्वहित व परहित, रामायण
मैं एक चौपाई सुनते आ रहे हैं, 
परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।
इसका मूल अर्थ है दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं व दूसरों को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुंचाने के समान कोई पाप नहीं।
दैनिक जीवन में हम कई बार शब्दों का प्रयोग करते हैं, वे शब्द हम किस प्रकार उनका प्रयोग करते हैं, वैसा ही परिणाम हमें देते हैं। 
             परहित का चिंतन अवश्य करना चाहिये, पर वर्तमान समय घोर कलिकाल है, अतः स्वहित को साधते हुए परहित भी हम किस प्रकार कर सके, यही वर्तमान समय में उचित संयोजन जान पड़ता है। 
             हमारे परिवार के लिये जो मूलभूत आवश्यकताएं हैं, उनकी परिपूर्ति के उपरांत हम इस बात का भी अवश्य चिंतन करें,
हम सभी सामाजिक प्राणी है, जहां पर भी हम रहते हैं, उस घर के प्रति हमारी सर्वाधिक जिम्मेवारी है, उसे सही ढंग से पूर्ण करने के उपरांत हम अपने जीवन का कुछ समय समाज को भी अवश्य दें, 
चाहे वह विद्यादान के रूप में हो, द्रव्य के अंशदान के रूप में हो, निस्वार्थ भाव से परिचर्चा हो, इस प्रकार की गतिविधि से हम नियम पूर्वक जुड़े। 
                 इससे हमारे जीवन में मानसिक शांति की स्थापना होगी, हम अपने जीवन काल में सब सुखों को भोगते हुए भी परमपिता परमेश्वर के चरणों में वंदन करते हुए समस्त सुख जो हमें प्राप्त हुए हैं, उसके लिए उसका हृदय से वंदन करते रहें।
                स्वहित व परहित दोनों का ही सुंदर समायोजन अगर हम अपने जीवन काल में कर सके तो इसी जीवन में हम स्वर्ग या मोक्ष पा सकते हैं, निर्वाण पा सकते हैं।
               हम चिंतन की धारा को बदलें और आंतरिक परिवर्तन जैसे ही हम करेंगे, एक अलग ही अनुभूति हमें भीतर से प्राप्त होगी।
विशेष:-हम इसी जीवन काल में स्वहित व परहित का सुंदर संयोजन अगर कर सके यहीं पर हम स्वर्ग का निर्माण कर सकते हैं, दृष्टि बदले, सृष्टि स्वयं बदल जायेगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा 
जय हिंद 
जय भारत।