प्रिय पाठक गण,
सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, आज प्रवाह में हम बात करेंगे, बदलते परिवेश पर, आज सामाजिक जीवन में हमें जो एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, वह है, सामाजिक मूल्यों की बदलती स्थिति, अगर आज से मात्र 20 से 25 वर्ष पूर्व हम निगाह डालें, तो व्यक्ति किस प्रकार से धन उपार्जित करता है, उस पर भी समाज की निगाह होती थी, मगर विगत कुछ वर्षों में मूल्यों की जगह
धन की प्रतिष्ठा अधिक बड़ी है, धन किसी भी प्रकार से आये, अब इसकी स्वीकृति समाज में होने लगी है, यह जो परिवर्तन सामाजिक आया है, यह देखा जाये तो सामाजिक व नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन हीं हैं, किसी भी
समाज के नैतिक मूल्य अगर धराशायी होते हैं,
तो धीरे-धीरे समाज एक संवाद विहीन स्थिति
में पहुंच जाता है,
आज जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों की जगह धन ने ले ली है, जो किसी भी समाज के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है, पहले हम परिवार और समाज में इस बात को बड़ी दमदारी से रखते थे, की धन के आने के स्रोत
शुद्ध हो, लेकिन आज वर्तमान समय में हमें यह देखने को मिल रहा है, की जो धनी है, उन्होंने धन किस प्रकार से कमाया, यह कोई मायने नहीं रखना, यह जो अवमूल्यन है समाज का, यह ठीक नहीं है, और दिन प्रतिदिन इसमें वृद्धि हो रही है, जो सही चिंतन करते हैं, उन्हें इस बारे में सोचना होगा।
धन कमाना कोई बुरी बात नहीं, मगर धन का स्रोत पारदर्शी व मूल्यों पर आधारित होना चाहिये, क्योंकि उसी से समाज में स्वस्थ
मूल्यों का निर्माण होगा, इस पर सभी वर्ग के लोगों को चिंतन करना चाहिये, विशेष कर जो बुद्धिजीवी वर्ग है, राजनीतिक व्यक्ति, शिक्षक, पत्रकार, डॉक्टर, व्यापारी वर्ग इन सब वर्गों को चिंतन करना चाहिये, जो हमारा सामाजिक परिवेश इस प्रकार बदल रहा है, वह किसी भी समाज की नैतिक उन्नति तो नहीं कर सकता,
बदलते परिवेश में हमें नए साधन तो अपनाना चाहिये, मगर मूलभूत जो नीतिगत सिद्धांत है,
उन्हें हमें नहीं भूलना चाहिये।
विशेष:- बदलते परिवेश में आर्थिक पहलू भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, मगर वह हम किस प्रकार से अर्जन कर रहे हैं, उस और हमारी निगाह जरूर होना चाहिये।
आपका अपना
सुनील शर्मा,
जय भारत,
जय हिंद।