प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन,
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज हम प्रवाह में चर्चा करेंगे, छल पर,
छल, यानी किसी से कपट पूर्ण व्यवहार, 
किसी को धोखा देना, किसी को भी छलना
या धोखा देना मानवीय गरिमा की दृष्टि से भी उचित नहीं, मगर आज समाज में चारों और 
छल का ही वातावरण है, व्यक्ति सच बोलना ही नहीं चाहता, वह छल से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है, जबकि छल से प्राप्त की हुई कोई भी वस्तु, धन या पद अधिक देर तक कायम नहीं रहते, वे उसके हाथ से चले जाते हैं। कभी-कभी तो मनुष्य अपने आप से छल कर बैठता है, वह अपने आप को झूठा दिलासा प्रदान करता है, आगे बढ़ाने के 
 गलत रास्ते चुन लेता है, व पतन के मार्ग की
और चला जाता है, इस प्रकार वह अपने आप से ही छल करता है।
     छली व्यक्ति भले कुछ समय के लिए अपने आप को छल से आगे कर ले, मगर अंततः वह पराजित होता ही है, जब कोई हमें छले तो हमें कैसा लगेगा?   इसीलिए हमें जीवन में छल का प्रयोग नहीं करना चाहिए,
वरना उसका अंतिम परिणाम हमेशा दुखदायी होगा, जो भी हो स्पष्ट कहें, क्योंकि आखिरकार छल पकड़ा ही जाता है, और छली व कपटी व्यक्ति का कोई भी विश्वास नहीं करता, छल हमें अपनी अंतरात्मा में भी 
नैतिक रूप से पतन की ओर ले जाता है।
आप अगर इतिहास में भी देखें, तो छली व्यक्ति अधिकांश परास्त ही हुए हैं, उनका अंतिम हश्र हमेशा दुखद हुआ है, फिर हम क्यों न छल से दूर रहे ।
विशेष:- छल का परिणाम हमेशा ही बुरा होता है, इसलिए किसी को भी न छले, छल का अंतिम परिणाम हमेशा दुखदायी होता है वह हमें नैतिक पतन की और ले जाता है, इससे हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल होती है।
अतः जीवन में छल से दूर रहे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, यात्रा पर, 
यह शब्द सुनने में तो बड़ा छोटा लगता है,
मगर इसके कई मायने हैं, हम सभी का जीवन एक अनूठी यात्रा ही तो है, अपने संपूर्ण जीवन में हम निरंतर एक यात्रा ही तो कर रहे हैं, यात्रा हमारे अपने भीतर की भी हो सकती है, 
जिसे हम आंतरिक यात्रा कह सकते हैं। 
       मनुष्य अपने अनुभव को बढ़ाने के लिए,
जिज्ञासा के कारण अलग-अलग देशों की यात्रा करते हैं, वहां के परिवेश से व संस्कृति से रूबरू होते हैं। हमारी सबकी अपनी-अपनी यात्रा है, और सबके अपने-अपने अनुभव है। 
अपने जिज्ञासु स्वभाव के कारण मनुष्य शुरू से ही यात्रा करता रहा है, ऐसे जिज्ञासु स्वभाव के  कारण मनुष्य ने अंतरिक्ष यात्रा भी कर ली है, यात्रा कई प्रकार की है, धार्मिक यात्रा, आंतरिक यात्रा, अंतरिक्ष यात्रा, व विभिन्न खेल, जो खिलाड़ी खेलते हैं, उनके संबंध में एक देश से दूसरे देश में यात्रा, रेल यात्रा, बस यात्रा, जल यात्रा ऐसे विभिन्न स्वरूप यात्रा के हैं, यानी हमारे जीवन का हर पहलू किसी न किसी यात्रा से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है, विभिन्न यात्राएं हमें विभिन्न दृष्टिकोण प्रदान करती है, जीवन के नए आयामों से परिचय कराती है, तो  हम जीवन के विभिन्न यात्रा -पडावो से गुजरे 
व जीवन का आनंद उठाएं। 
    हर यात्रा हमें कुछ सिखाती है, उससे सीखे,
नित्य नूतन यात्रा करते रहे, हमारे जीवन में एक आध्यात्मिक यात्रा भी होती है, जो मैं आंतरिक रहस्यो से परिचय कराती है।
    कुल मिलाकर मेरे कहने का तात्पर्य है, हम अपने जीवन में विभिन्न यात्रा पड़ावों से गुजरते हैं, उनसे सीखे, यात्राओं का आनंद लें।
विशेष:- हम सभी का जीवन विभिन्न यात्राओं का एक समावेश है, हमें विभिन्न यात्राओं से 
जीवन में गुजरना ही होता है, यात्राओं का आनंद ले, उनसे सीखे। यात्रा करते रहे।
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
  सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, प्रतिकूलता पर, जीवन में हर समय अनुकूलता ही हो, यह संभव नहीं, लेकिन प्रतिकूलता हमें जीवन में अधिक सिखाती है, अनुकूल स्थिति में तो हर कोई अपना लक्ष्य हासिल कर सकता है, मगर जब स्थितियां  प्रतिकूल हो, तब संघर्ष अधिक बढ़ जाता है, लेकिन वही संघर्ष हमें और अधिक निखारता भी है, इसलिए जीवन में 
प्रतिकूलताओं का स्वागत करें, वे आपके जीवन में आती ही इसलिए है, ताकि आप उनसे संघर्ष कर अपने आप को और निखार  सके, उदाहरण के तौर पर हम किसी खेल का उदाहरण  लेते हैं, जो खिलाड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता
है, उसकी ही जय- जयकार   होती है।
         जो व्यक्ति अपने जीवन में जितनी प्रति कूल स्थितियों का सामना करता है, उसके जीवन में अधिक संघर्ष के कारण सफलताएं भी और अधिक हासिल होती है, और प्रतिकूल परिस्थितियों में संघर्ष के कारण 
आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है।
      इतिहास गवाह है, जो भी प्रतिकूलताओं से घबराते नहीं, वही अपने जीवन में इतिहास रचते हैं, जितनी अधिक प्रतिकूल स्थितियों का सामना हम करेंगे, उतना ही संघर्ष भी बढ़ेगा, 
और संघर्ष बढ़ने के कारण हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ेगा, प्रतिकूल परिस्थितियों हमारा  व्यक्तित्व गढ़ने आती है, इसलिए 
प्रतिकूल परिस्थितियों का स्वागत करें व
जीवन में उपलब्धियो के लिए तैयार रहें।
       अनुकूल परिस्थितियों में तो हर कोई लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों होने पर भी हारता नहीं, दुनिया 
उसी की जयकार करती है, आप पाएंगे 
जो भी व्यक्ति अपने जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों से जितना अधिक गुजरा है,
उसके हिस्से में सफलताएं भी उतनी ही अधिक होती है। हम क्रिकेट का उदाहरण लेते
है, जब सब बल्लेबाज कम रन बनाते हैं, तब प्रतिकूल परिस्थितियों में जो बल्लेबाज अच्छे रन बनाता है, उसी की वाहवाही होती है।
और वह धीरे-धीरे प्रतिकूल परिस्थितियों में रन बनाने  के कारण सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज के रूप में स्थापित होता जाता है। ऐसा ही हमारा जीवन भी है, जितनी प्रतिकूलताओं का हम सामना करेंगे, उतनी ही सर्वश्रेष्ठ हमारी उपलब्धियां भी होगी।
विशेष:- प्रतिकूलता हमें जीवन में सिखाने के लिए आती है, इसलिए उनका हृदय से स्वागत करें, क्योंकि आपके जीवन में निखार लाने के लिए आई है, जितनी अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों होगी, संघर्ष भी उतना ही होगा 
और उपलब्धियां भी फिर वैसी ही होगी।
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगें, भ्रष्टाचार पर, 
हमारे देश में कई सरकारों ने कार्य किया, 
नगर भ्रष्टाचार पर कोई भी सरकार लगाम नहीं लगा सकी, इसका सबसे बड़ा कारण यह है, भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार का रूप ले चुका
है, आप किसी भी सरकारी विभाग में कोई कार्य नियम से करने के लिए जायेंगे, तो भी वहां पर नियम से कार्य होना मुश्किल ही है, 
क्योंकि वहां बीच के लोग जो बैठे हैं, जो इस भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं, उनकी सहायता लिए बगैर हम अपना कोई कार्य करा ही नहीं सकते, सब कुछ नियम पूर्वक होने पर भी
आपको भ्रष्टाचार रूपी देवता पर चढ़ावा तो चढ़ाना हीं पड़ता है।
     विश्व के 180 देशों में भ्रष्टाचार की जो सूची हैं, उसमें भारत का स्थान अभी भी 
96  वे स्थान पर है, आजादी के इतने वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार ने देश को भीतर से जर्जर कर रखा है, इसके लिए हम सभी सामूहिक रूप से जवाबदार है, जब तक हम स्वयं इन बातों से समझौता करते रहेंगे, बदलाव संभव नहीं है, जनता जनार्दन ही अगर चाहे तो भ्रष्टाचार खत्म हो सकता है, किसी भी प्रकार
के भ्रष्टाचार से समझौता न करें, ऐसा प्रण  सभी नागरिक ले ले, तब ही स्थिति में बदलाव आ सकता है, आईये, आज हम यह प्रण करें, 
ना तो स्वयं भ्रष्टाचार करेंगे, ऐसे लोगों का सहयोग करेंगे, अगर यह सब के भीतर भाव जाग उठे, वह ईमानदारी पूर्वक इस पर अमल
हो, तो अब भी तस्वीर बदल सकती है, अगर जनता अपनी पूर्ण इच्छा शक्ति से इस पर अमल करें, तभी यह संभव है। दिन पर दिन नहीं तो भ्रष्टाचार बढ़ता रहेगा, वह हम केवल देखते रहेंगे, जब तक हम आगे बढ़कर इसका मुकाबला नहीं करते, इसे हटाना संभव नहीं।
विशेष:-   जिस देश में भी भ्रष्टाचार होता है, देश भीतर से कमजोर हो जाता है, हमारे अपने देश के प्रति भी नैतिक जवाबदारी है,
वह हमें सचेत रहकर भ्रष्टाचार से मुकाबला
करना होगा, वरना भीतर ही भीतर भ्रष्टाचार 
दीमक की भांति इस देश को खोखला कर देगा , हम सभी का कर्तव्य है, हम जागे, जन जागरण के बिना इसका सफाया होना संभव नहीं। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
    आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, अनुभव पर, हम और आप अपने-अपने जीवन में विभिन्न अनुभवों से गुजरते हैं, और वे अनुभव हमें जिंदगी की सीख देते हैं, वह हमें सिखाते हैं, 
कब ,कहां ,कैसा कदम उठाना उपयुक्त है, 
जिंदगी के अनुभव से सभी सीखते हो, ऐसा जरूरी भी नहीं, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति उन अनुभवों से जरूर सबक सिखता है, जो उसे अपने जीवन में प्राप्त हुए, हमारे वृद्धजन, जिनके पास अनुभवों का भंडार होता है, हमें उनसे वार्तालाप करना चाहिए, वह जीवन में  जिन अनुभवों से गुजरे हैं, वह हमें उनसे जानना चाहिए, क्योंकि हम अपने अनुभव से सीखेंगे तो और अधिक समय लगेगा, इससे अच्छा तो यह है, हम अपने बुजुर्गों के अनुभव से सीखे, उनके अनुभव हमारे लिए मार्गदर्शन का कार्य कर सकते हैं, वे जिंदगी में जितने अनुभवों से गुजरे होते हैं, उतने हम नहीं,
क्योंकि उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा 
उन अनुभवों का साक्षी रहा है, इसलिए हमें नियमित रूप से उनके संपर्क में रहना चाहिए, जो अपने अनुभवों से व बुजुर्गों के अनुभव से सीखता है, उनसे सबक प्राप्त करता है, 
वह अपने जीवन में ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होता है, जिंदगी के अनुभव वह शिक्षक है, जो हमें जिंदगी को जीने का पाठ पढ़ाते हैं, सबके अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं, मगर उन अनुभवों से हम सीखें।
विशेष:- अनुभव हमें जिंदगी जीना सिखाते हैं,
बशर्ते हम उन अनुभवों से सीखे, बुजुर्ग लोग 
अनुभवों की खान होते हैं, उनसे अपने जीवन में मार्गदर्शन अवश्य लें, जिससे आप अपने जीवन में निरंतर प्रगति की और अग्रसर हो। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।

प्रिय पाठक गण,
     सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
   आज प्रवाह में हम चर्चा करेंगे, दृष्टिकोण पर, किसी भी विषय, कार्य के प्रति हमारा दृष्टिकोण किस प्रकार का है, सकारात्मक, 
नकारात्मक या संतुलित, देखा जाये तो पूर्ण सकरात्मक या पूर्ण नकारात्मक, दोनों ही 
दृष्टिकोण की बजाय एक संतुलित दृष्टिकोण या नजरिया हमें किसी कार्य विषय के बारे में
एक सही दृष्टिकोण प्रदान करता है, क्योंकि तब हम केवल सकारात्मक या नकारात्मक 
दोनों ही पहलुओं को जब एक संतुलित दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हम एक बेहतर संभावना को जन्म देते हैं, क्योंकि जब हम दोनों पहलू देखते हैं, तो हम किसी भी कार्य या विषय को लेकर सही मंथन कर सकते हैं,
और जब हमारा नजरिया या दृष्टिकोण 
संतुलन वाला होगा, तो उसके परिणाम भी 
हमें उतने ही बेहतर प्राप्त होंगे।
         जब किसी भी विषय में हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक होगा, तो हम उसके हल के बारे में सोचेंगे, इसलिए निश्चित ही 
हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक दिशा में तो होना ही चाहिये, जब हम खेल के मैदान में उतरते हैं, तो हमें जीत की कल्पना के साथ ही उतरना चाहिये, लेकिन हमें सभी पहलुओं को ध्यान रखना चाहिये, एक किसान भी जब खेती करता है, तो सर्वप्रथम वह जमीन को सुधारता है, ऐसे ही जब भी हम किसी कार्य की शुरुआत करना हो, तो हमें भी हमारी  मनोभूमि को सबसे पहले सुधारना होगा,
उसमें अच्छे विचारों का हमें बीज बोना होगा,
मगर वह बीज भी तभी उत्पन्न होगा, जब जमीन अच्छी होगी, तो सर्वप्रथम तो हमें 
हमारे दृष्टिकोण में यह परिवर्तन लाना चाहिये,
स्थिति चाहे हमारे पक्ष में हो या विपक्ष में, हमें हमेशा एक सकारात्मक रूख के साथ ही उनका सामना करना चाहिये, क्योंकि सकारात्मक विचारधारा ही वह मनोभूमि है,
जहां अच्छे बीज पनप सकते हैं, व जब बीज अच्छे होंगे, जमीन अच्छी होगी, तो फसल तो निश्चित ही अच्छी होगी, मगर अच्छी फसल के लिए भी हमें समय-समय पर खरपतवार को हटाना होगा, तभी फसल श्रेष्ठ होगी। 
       इसी प्रकार किसी कार्य को करते समय भी सकारात्मक दृष्टिकोण से उसे शुरू करें, 
वह समय-समय पर जो नकारात्मकता नाम की खरपतवार आती है, उसे भी प्रयत्न करके हटाते जाए, ताकि हमें श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त हो।
विशेष:-  किसी भी विषय या कार्य के बारे में 
हमारा सकारात्मक दृष्टिकोण ही हमें औरों से अलग दिशा दे सकता है, क्योंकि जब हम सकारात्मक दृष्टि से सोचते हैं, तब हम परिणाम मूलक सोच की और अग्रसर होते हैं,
इसलिए दृष्टिकोण का जीवन में बड़ा ही महत्व है, व हमारा सकारात्मक दृष्टिकोण ही निरंतर हमें आगे की और ले जाता है। 
आपका अपना 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।
प्रिय पाठक गण,
   सादर नमन, 
आप सभी को मंगल प्रणाम, 
  आज प्रवाह में हमारा विषय है ,आवरण 
हम जैसे हैं, उस पर हम एक आवरण चढ़ा लेते हैं, और धीरे-धीरे उन आवरणों की संख्या
इतनी अधिक हो जाती है, हम अपना मूल स्वरूप ही खो बैठते हैं, हम जैसे हैं, जो भी हमें प्रकृति से प्राप्त है, उसे उसी मूल रूप में रखना हमारा कर्तव्य है, मगर शायद आज का दौर प्रस्तुतीकरण का दौर है, आपमें भले उतनी काबिलियत ना हो, पर उस पर आवरण तो चढ़ा ही सकते हैं, एक या दो आवरण हो, 
तब तक तो ठीक है, मगर जब आवरण की परतें इतनी अधिक हो जाए कि सत्य ही समझ नहीं आये, तो हमें फिर से एक बार 
यह समझना होगा, सत्य छिपता नहीं, भले ही उस पर कितने भी असत्य के आवरण चढ़ा दिये
 जाये, मगर वर्तमान परिदृश्य मैं अगर हम समाज को देखें, तो चहूं और एक ही प्रकार
का वातावरण है, किस प्रकार हम ऐसा प्रस्तुतीकरण करें कि हमारी खामियां तो 
नजर ही नहीं आये, हमारा ऊपरी आवरण 
इतना प्रभावशाली हो, कोई व्यक्ति  हमारा सही व्यक्तित्व जान ही न सके, जो हम आवरण में लपेटकर पेश कर दे, बस वही सच नजर आये, यह विकृति समाज में, राजनीतिक दलों में व संपूर्ण समाज के विभिन्न वर्गों में 
तेजी से व्याप्त हो गई है, हम किसी के भी व्यक्तित्व का सही आकलन ही नहीं कर पाते, क्योंकि आवरणों की परत ही इतनी चढ़ी हुई है, जिसमें सब कुछ धुंधला नजर आता है। 
समाज में व्याप्त यह जो परिवर्तन है, वह सामाजिक हित में तो कतई उचित नहीं है,
सच आखिरकार कितनी भी परतो में हो, सामने आता ही है, इसलिए आवरण कितना जरूरी है, यह अवश्य समझे, अनावश्यक रूप से इसका जो दुरुपयोग हो रहा है, उससे हमें सावधान रहने की जरूरत है। 
विशेष:- आज हर व्यक्ति इतने आवरण में कैद है, कि उसका मूल व्यक्तित्व या स्वरूप 
जो प्रकृति ने उसे प्रदान किया है, आवरणों 
की परतो ने समाज में एक अस्वस्थ परंपरा को जन्म दे दिया है, जहां बिना आवरण के कोई सामने आना ही नहीं चाहता, और यह समाज के लिए घातक है, कोशिश करें आवरण की आवश्यकता जितनी उचित हो, 
केवल उतनी मात्रा में ही उसका प्रयोग करें। 
आपका अपना, 
सुनील शर्मा, 
जय भारत, 
जय हिंद।